भोजपुरी में सच्ची कहानी आने लगी है: संजय पांडेय

भोजपुरी फिल्मों में कई खलनायकों को दर्शकों ने देखा है लेकिन इन दिनों संजय पाण्डेय की र्चचा काफी हो रही है। अब तक छह दर्शन से भी ज्यादा फिल्मो में अपने अभिनय से दर्शकों की तालियां बटोर चुके संजय पांडेय ने अपनी हर फिल्म में अलग अलग किरदार निभाये हैं। लेकिन इस समय वे आज रिलीज हो रही बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘‘राजा बाबू‘‘ को लेकर काफी उत्साहित हैं। इसमें संजय पांडेय का किरदार काफी मनोरंजक है जिसका नाम डमरू चौबे है. इस फिल्म में संजय का रूप थोड़ा अलग है और उनकी एक आंख पत्थर की है। उनसे बातचीत-
इतनी फिल्में करने के बाद एक्टरों की चाल-ढाल में परिवर्तन आ जाता है यानी गुरूर आ जाता है, लेकिन आप वहीं के वहीं हैं?

हमारे यहां मान्यता है कि सफलता आदमी को झुका देती है और विनम्र बना देती है। उसकी तुलना फलदार पेड़ से की जाने लगती है। मैं तो उस सफलता का दावा भी नहीं कर रहा हूं। मुझे अभी लंबा चलना है। जहां तक गुरूर का सवाल है तो किस बात का करूं? क्या अपने दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, आमिर आदि एक्टरों में कभी गुरूर देखा है? उनकी सफलता से तो कोई मुकाबला भी नहीं कर सकता। वैसे सबके सामने उन लोगों के पतन की कहानी भी मौजूद है, जिन्होंने कामयाबी को गरूर के रूप में देखा। इसके बाद भी अगर मैं किसी घमंड के मोह में पड़ूं तो मुझ जैसा नासमझ और कोई नहीं मिलेगा। भोजपुरी एक छोटी इंडस्ट्री है, यह जिंदा रहेगी तो हम जैसे लोग भी जिंदा रहेंगे। मेरी कोशिश तो यह है कि मैं इस सिनेमा का पार्ट बना रहूं। अब तक 80 फिल्मों के आंकड़े तक पहुंच गया हूं और उम्मीद कर रहा हूं की 2016 तक यह सौ पूरा हो जाये। यानी अपनी अभिनय यात्रा का शतक समारोह बना सकूं। इस साल की फिल्मों में ‘‘राजा बाबू‘‘ मेरे करियर में मायने रखता है जो 14 अगस्त को रिलीज हो रही है। यह बहुत ही प्यारी फिल्म है जिसमें दिनेश लाल यादव, आम्रपाली, मोनालिसा, प्रकाश जैश, गोपाल राय जैसे अन्य कई कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है। मुझे उम्मीद है की यह इस साल की ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित होगी। फिल्म के निर्देशक मंजुल ठाकुर के साथ यह मेरी चौथी फिल्म है, वहीं निरहुआ जी के साथ मैंने कई फिल्में की है। मैं बहुत ही साधारण इंसान हूं, धैर्य और शालीनता के साथ जी रहा हूं। भले खलनायकी करता हूं लेकिन निजी जीवन में परदे के किरदार से बिलकुल अलग हूं। किस हद तक आप संतुष्टि का अनुभव कर रहे हैं और इसके आगे का रास्ता किधर जाता है ? फिल्म को जब करियर बना लिया है तो कहीं और जाने की बात सोच भी नहीं पा रहा हूं। यह फैसला तो मुझे पहले करना चाहिए था। सिनेमा ही मेरी जिंदगी है और इसे संवार कर चलना चाहता हूं, ताकि कल को कोई उंगली नहीं उठा सके। खलनायक तो अजीत, अमरीशपुरी, प्राण आदि भी रहे जिन्होंने कामयाबी का स्वाद जी भर कर लिया लेकिन निजी जीवन में वे इस तरह शालीन रहे कि लोग उन्हें हीरो की तरह याद कर रहे हैं। यह मानता हूं कि सिनेमा में हीरो हमेशा ऊपर होता है, लेकिन अगर खलनायक नहीं रहेगा तो उनके किरदार को भी याद रखना मुश्किल हो जाएगा। मैं खुद को उस स्थिति में लाना चाहता हूं कि दर्शक मुझे हमेशा जेहन में रख सकें, इससे बड़ी और कोई कामयाबी नहीं हो सकती। मैं अभी जहां तक पहुंचा हूं , वह मेरी उम्मीद का शायद पचास प्रतिशत भी नहीं है। हां, इस बात से संतुष्ट जरूर हूं कि भोजपुरी दर्शकों ने मुझे लोकप्रियता का मुकुट पहना दिया है। जहां भी जाता हूं लोग हाथों हाथ उठा लेते हैं। मुझे लगता है कि अगर भोजपुरी फिल्मों का बजट और स्क्रिप्ट अच्छा होता तो किसी भी क्षेत्रीय सिनेमा से पीछे नहीं रहता। दर्शक हमारे पास बहुत हैं, लेकिन साधन में बहुत पीछे हैं। यही बात चुभती रहती है। यही चीज है जो असंतोष को बढ़ाता जा रहा है और जो इज्जत हासिल होनी चाहिए थी वह नहीं मिल रही है।

भोजपुरी इंडस्ट्री के बदलने की बात हर कोई कर रहा है, यह किस हद तक सही है? आपकी फिल्में क्या उस बदलाव का कोई उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं?

भोजपुरी को जितना बिगड़ना था, वह हो गया। इसके आगे तो डूबने की ही बात हो सकती है, लेकिन यह सच है की भोजपुरी सिनेमा में बदलाव शुरू हो चुका है। यह इस साल की फिल्मों से भी अंदाज लगाया जा सकता है। मैंने इस साल जितने फिल्में की है वे हर स्तर पर काफी मजबूत हैं। अगर आने वाली फिल्मों का उदाहरण दूं, तो कहूंगा कि ‘‘दुलारा‘‘, ‘‘बालम रसिया,‘‘ ‘‘यादव पान भंडार‘‘, ‘‘शिव रक्षक, बैंड बाजा बरात‘‘, ‘‘दहशत‘‘, ‘‘लेके आ जा बैंड बाजा ए पवन राजा‘‘, ‘‘बलमुआ तोहरे खातिर‘‘ आदि फिल्मों में रिचनेस दिखाई पड़ेगी। अभी मेरी एक फिल्म ‘‘टेंडर‘‘ की शूटिंग चल रही है, इसके निर्माता हैं डॉक्टर एस डी गौतम गोविंदा। यह उत्तर प्रदेश के अंडर्वल्ड की कहानी है। मेरा किरदार बंका यादव का है जो बाहुबली है। वह अपनी दबंगई से सारे ठेके अपनी ही शर्तों पर लेता है और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। लेकिन एक ऐसा पुलिस अफसर आता है जो बाहुबली को नेस्तनाबूद करने की कसम खा लेता है, यानी मेरा कहना है कि भोजपुरी में भी रियल कहानी आने लगी है और लोग उसे पसंद भी करने लगे हैं। यह कहना अब बेकार है दर्शक द्विअर्थी संवाद और गानों को ही पसंद करते हैं।