इंतकाम लेने की तैयारी में रितु शास्त्री

बनारसी बाला रितु शास्त्री अब इंतकाम लेने के मूड में आ गयी है। ऐसा नहीं कि रितु के साथ कुछ वैसा हुआ है, जिसकी आशंका आपको है। वह तो कंगना को लेकर इस तेवर में है। कंगना का जिस दरिंदगी के साथ बलात्कार हुआ, उसे रितु भुला नहीं पाती। शुरू में तो वह हताश हो गयी थी, आत्महत्या करने पर उतारू थी। लेकिन, जब से राजेश भाई बनकर एक ढ़ाल के रूप में उसके समक्ष आ खड़ा हुआ है, रितु का भवानी रूप जागृत हो उठा है। अब तो सचमुच बलात्कारियों और समाज के आतातायियों की खैर नहीं। कानपुर विश्वविद्यालय की स्नातक और कम्प्यूटर की डिप्लोमा होल्डर रितु का गुस्सा रोकना अब निर्देशक बालकृष्ण के वश में भी नहीं है।
निर्देशक?! जी हाँ निर्देशक तो होगा ही न! क्यांेकि भईया बात ही पूरी फिल्मी है। आप भी अपना मनो-मस्तिष्क साफ कर लें। रितु अपनी किसी सहेली को लेकर परेशान नहीं थी, अपितु, उस कंगना को लेकर वह तनाव में जी रही थी, जिसको उसने अपने में ढाला था, आत्मसात किया था। माँ वैष्णवी फिल्म्स के बैनर तले बनी ‘कंगना का इंतकाम’ में रितु ने शीर्षक भूमिका निभायी है और कंगना के रूप में बलत्कृत लड़की को जीया है। इस बात के विश्लेषण के लिए रितु से बातचीत हुई, प्रस्तुत है, वार्तालाप के मुख्य अंशः
ऽ सर्वप्रथम, रितु अपना परिचय दें।
वाराणसी में जन्मी हूँ। कानपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. पास हूँ और कम्प्यूटर डिप्लोमा लेकर सीधे मुंबई आ गयी। परिवार से विरोध मिला पर मैं अपनी धुन में रही। अंततः सफल हुई।
ऽ इसे थोड़ा और स्पष्ट करें?
मेरी पहली फिल्म थी-‘दमाद चाहीं फोकट में’, लेकिन, इसमें मैं हीरोइन नहीं थी। काम करते करते मुझे लगा, भोजपुरी फिल्मोद्योग में यदि अपनी पसंद का काम करना है तो फिल्म भी खुद ही बनानी पड़ेगी और फिर, अचानक मैंने एक निर्णय लिया।
 ऽ किस तरह का निर्णय?
‘दमाद चाहीं…………’’ के निर्देशक बालकृष्ण सिंह का काम करने-कराने का अंदाज मुझे पसंद आया और मैंने उनको ही अपने जहाज का कप्तान नियुक्त करने का निर्णय लिया। निर्माण में अकेले उतरना थोड़ा जोखिम भरा लगा, इसलिए ओम प्रकाश पांडेय के साथ जुड़ गयी और फिर ‘‘माँ वैष्णवी फिल्म्स के बैनर तले बनायी ‘‘कंगना का इंतकाम’’
ऽ फिर कंगना के रूप में आपने क्या-क्या किया, स्पष्ट करें?
कंगना एक सीधी सादी लड़की है, जिसका कुछ स्थानीय दबंग और बदमाश लोग गैंग रेप कर देते हैं। इस घटना के बाद कंगना सन्न हो जाती है और आत्महत्या करने की कोशिश करती है। राजेश नाम का एक युवक उसे बचा लेता है और उसके अंदर जीने की नयी इच्छा शक्ति भर देता है। फिर वो दोनों उस दरिंदे से कैसे बदला लेते हैं, यही है ‘‘कंगना का इंतकाम’’।
ऽ इस इंतकाम के लिये क्या-क्या तैयारियाँ कीं आपने?
कंगना पूर्वांचल की लड़की है, इसलिए हमें मार्शल आर्ट की ज़रूरत नहीं थी, देसी शैली में उठापटक-मारपीट करानी थी, सो मंैंने सीखा और खूब अच्छा किया। एक्शन और ब्लास्ट सीन मंे तो मैं और राजेश बुरी तरह झुलस गये थे, जख्मी हो गये थे।
ऽ एक नन-स्टारर फिल्म से आप क्या उम्मीद करती हैं?
एक अभिनेत्री के रूप में ‘कंगना का इंतकाम’ मुझे स्थापित कर देगी क्यांेकि इसमें मैं कोई ग्लैमर डाॅल नहीं, एक जीवटवाली लड़की हूँ, मर्दानी कह सकते हैं। एक निर्मात्री के रूप में भी मैं निश्चिंत हूँ, क्योंकि गंदे लोग, गंदी सोचवालों को खुश करने के लिए मैं गंदी फिल्म बनाने की पक्षधर नहीं हूँ। मैं चाहती हूँ कोई भी किसी के साथ निश्चिंत होकर फिल्म देखे और बाहर निकले तो चर्चा करे, बात करने से बचे नहीं।
ऽ इस इंतकाम के बाद?
हिन्दी मंे है-‘फेमस पांडेय’। इसमें माॅडल विपिन शर्मा मेरे हीरो होंगे और निर्देशक होंगे एकांत।