भोजपुरी फिल्मों में राजनीति बहुत होती है’ प्रियंका पंडित

भोजपुरी फिल्मों में कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही प्रियंका पंडित के लिये फिल्म अब शौक से ज्यादा जुनून हो गयी है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर की रहने वाली और अहमदाबाद में पली-बढ़ी प्रियंका ने अभी तक आठ-नौ फिल्में की हैं मगर वह इंडस्ट्री की राजनीति और मानसिकता को समझ चुकी हैं। उनसे बातचीत

भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री के अब तक के अनुभवों ने क्या-क्या सिखाया है? क्या अच्छा लगा है और क्या बुरा?

सिनेमा ही क्यों, जीवन के हर क्षेत्र में नये-नये अनुभव मिला करते हैं। वे अनुभव जाने-अनजाने कुछ न कुछ सिखाते ही हैं। जहां तक भोजपुरी इंडस्ट्री की बात है, यह छोटी मगर शायद हिंदी इंडस्ट्री से ज्यादा जटिल है। भोजपुरी में चुपके-चुपके अचानक ऐसा कुछ हो जाता है कि आश्र्चय होने लगता है। यहां कोई भी हीरो-हीरोइन बन सकता है। यह नहीं देखा जाता है कि उसमें टैलेंट है या नहीं। लड़की को खूबसूरत और लड़के को पैसा वाला होना चाहिये या फिर सिंगर। हर किसी को यहां भाग्य आजमाने और चांस पाने का अधिकार है लेकिन मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि सिनेमा को नुकसान नहीं होना चाहिये।

यह तो निर्माता और निर्देशकों को भी समझना चाहिये कि किसे चांस देना चाहिये और किसे नहीं?

दरअसल यहां भोजपुरी फिल्मों में राजनीति बहुत होती है। किसे लिया जाना चाहिये और किसे नहीं, यह तय पुराने कामयाब लोग करते हैं। इसलिये कि उनके पास काम नहीं है लेकिन नाम है, ऐसे लोग आज सलाहकार की भूमिका में आ गये हैं। नये लोग कुछ लिहाज और कुछ उनके सम्मान का ख्याल करते हुए उनकी बातें मानने के लिये तैयार हो जाते हैं। वे लोग इसी का फायदा उठा लेते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं, वही जानें लेकिन मुझे लगता है कि इससे टैलेंटेड लोगों को नुकसान उठाना पड़ता है। हमारे सामने तो इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि 50 साल हो गये इस इंडस्ट्री को, लेकिन हम इसे आगे बढ़ाने की जगह पीछे लौटाने में लगे हुए हैं। इसके लिये हम सब जिम्मेदार हैं, दर्शक नहीं। दर्शक तो इस सिनेमा को जिंदा रखना चाहते हैं।

कोई ऐसी उम्मीद दिखाई पड़ रही है कि भोजपुरी सिनेमा की या तो पुरानी पहचान लौटे या नयी मजबूत पहचान बने?
अच्छा सिनेमा की पैरेलल धारा भी बह रही है लेकिन उसकी रफ्तार धीमी है। कुछ लोग अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं। उनमें अगर एक नाम किसी का लेना हो तो मैं दिनेश लाल यादव निरहुआ जी का लूंगी। वे अपनी फिल्मों से लगातार यह जाहिर कर रहे हैं कि अच्छे सिनेमा के दर्शक भी भोजपुरी में काफी हैं। उनकी फिल्में काफी साफ-सुथरी, बेहतर स्क्रिप्ट और अच्छे बजट वाली होती है। मनोरंजन भी काफी होता है। ‘‘निरहुआ हिंदुस्तानी’ देखकर कोई भी गर्व कर सकता है। उनकी फिल्में भोजपुरी का ट्रेंड बदल रही है। वे चूंकि खुद भी स्क्रिप्ट पर मेहनत करते हैं इसलिये गंदगी के लिये कोई जगह नहीं होती है। मेरा तो मानना है कि अगर राइटर किसी की जिद के सामने झुकना छोड़ दें तो आधी समस्या यूं ही खत्म हो जायेगी।