निगेटिव किरदारों से परहेज नहीं – प्रदीप पांडे चिंटू

करीना कपूर की समझ में आ गया है कि अब बॉलीवुड में लीड हीरोइन की भूमिकाओं के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं बचा है, इसीलिए उन्होंने एक्टिंग ओरिएंटेड रोल्स पर जोर देना शुरू कर दिया है। जानकारों की मानें, तो बेबो अब नेगेटिव किरदार निभाने के लिए भी राजी हो चुकी हैं। करीना का कहना है कि वे अभिनेत्री हैं, इसलिए उन्हें हर किस्म की भूमिकाएं अदा करनी ही चाहिए। क्या वे ऐसा इसलिए करने जा रही हैं कि उन्हें अब मेनस्ट्रीम फिल्मों में हीरोइन के तौर पर ज्यादा ऑफर नहीं आ रहे हैं? करीना का जवाब है कि नेगेटिव किरदार निभाने के लिए उनके पास किसी भी प्रोड्यूसर ने कभी एप्रोच नहीं किया। अगर उन्हें पहले भी नकारात्मक भूमिका निभाने को मिलतीं, तो वे जरूर साइन कर लेतीं। खैर, इसमें फिल्मकारों की भी कोई गलती नहीं है। करीना जिस तरह के रोल कर रही थीं, उससे ते उनकी इमेज विशुद्ध बॉलीवुडिया हीरोइन की ही सामने आ रही थी। अब जब कि खुद करीना ने अपने लिए इतनी बड़ी घोषणा कर दी है, तो उनके पास नेगेटिव किरदारों के विभिन्न प्रस्ताव आने शुरू हो जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि आखिर वे इस नए अवतार में भी कितना काम कर पाएंगी?
प्रदीप पांडे चिंटू का परिचय सिर्फ यह नहीं है कि ये
भोजपुरी सिनेमा के सबसे बड़े निर्देशक राजकुमार पांडे के पुत्र हैं बल्कि यह है कि अपनी मेहनत और टैलेंट के बल पर अपनी असरदार उपस्थिति दिखाकर कामयाब एक्टरों में शामिल हो चुके हैं। लेकिन बाकियों से कुछ अलग इसलिये हैं कि कई सफल फिल्में देने के बाद भी खुद को सुपर स्टार कहलाने से परहेज कर रहे हैं। इस सप्ताह उनकी एक फिल्म ‘‘दुलारा’ रिलीज हो रही है जो पुरानी डांस-परंपरा की झलक पेश करेगी। उनसे बातचीत
एक समय में यह डांस काफी पॉपुलर था। हर खुशी के मौके पर किया और कराया जाता था। क्या फिल्म ‘‘दुलारा’ के माध्यम से उसे जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है? भोजपुरी में सालों पहले लोगों का मनोरंजन इसी नाच के द्वारा किया जाता था। अगर देखा जाये तो भोजपुरी में सबसे पहले मनोरंजन का साधन इसी प्रथा से शुरू हुआ था जिसे लोग समय के साथ भूलते गए है। ‘‘दुलारा’ इसी प्रथा पर आधारित है जिसमें दर्शकों को नौटंकी देखने को मिलेगी। इसमें एक लड़का ही लड़की के कपड़े पहन कर लोगों का मनोरंजन करता है। इस फिल्म में मेरा किरदार भी कुछ इसी तरह का है जहां मैं लड़कियों के कपड़े पहन कर गांव के स्टेज पर डांस करके अपना और अपने परिवार का पालन -पोषण करता हूं। जहां तक जीवित करने के प्रयास की बात है तो यह समझना जरूरी है कि क्या आधुनिक समय में क्या लोग इसे स्वीकार करेंगे? आज इतने मनोरंजन के साधन आ गये हैं कि घर बैठे पूरी दुनिया के तमाशे देख लेते हैं। इस फिल्म में एक कहानी के माध्यम से याद दिलाया जा रहा है कि हमारा अतीत कुछ ऐसा भी था। सच कहा जाये तो यह एक इतिहास-दर्शन होगा। आज इस डांस का शायद कुछ लोग मजाक उड़ायें लेकिन यह तो मानेंगे कि हमारे खून में किस तरह संगीत-नृत्य और मस्ती थी।इसे किस तरह की फिल्म कहना मुनासिब होगा? पारिवारिक, सामाजिक या मस्ती वाली? इस फिल्म में तीनों धारायें मिलेंगी। यह त्रिवेणी है, फिल्म में एक परिवार है जिसमें मां-बेटे, भाई-बहन, पिता-बेटे के बीच के प्यार को दर्शाया गया है। लेकिन कहानी गांव और पूरे समाज से गुजरने लगती है। किस मजबूरी के तहत किसी लड़के को लौंडा बनना पड़ता है और उसके साथ किस-किस तरह के व्यवहार होने लगते हैं। फिल्म में मैं दो अलग-अलग किरदार निभा रहा हूं। एक तरफ, पूरा लड़की के अवतार नौटंकी करता हूं और दूसरी ओर सामान्य जीवन का। उसे दोनों रूपों में अन्याय को झेलना पड़ता है। गांव के एक दबंग आदमी अवधेश मिश्रा के अन्याय का शिकार मेरा परिवार रहा है। मैं रिवेंज लेना चाहता हूं और उसी रणनीति के तहत उसकी बेटी तनुश्री से प्यार का नाटक करने लगता हूं। उसे नहीं पता होता है कि मैं ही डांस कर लोगों का मनोरंजन और अपने परिवार का जीवन चलाता हूं। यह राज बाद में खुलता है, तब भी उसका प्यार खत्म नहीं होता है। लेकिन इस बीच दबंग से भयानक टकराव शुरु हो जाता है. इसमें वैसा एक्शन है जो आज तक भोजपुरी में नहीं आया है। मेरे लिए वैसे काफी मुश्किल थी यह फिल्म लेकिन निर्देशक राजकुमार पांडे ने मुझे हर तरह से तैयार कर दिया। इसमें गाने भी अच्छी संख्या में हैं, इसलिये कि उसके बिना फिल्म का कोई मतलब नहीं था। एक गाना रानी चटर्जी के साथ भी फिल्माया गया है। भोजपुरी में ऐसी बहुत कम फिल्में बनती हैंं जो पूरी म्यूजिकल हों, यह उनमे से ही एक है। इसमें दशर्कों को हर तरह के गाने सुनने को मिलेंगे, पारिवारिक, मस्ती भरे, नौटंकी-शैली के और इमोशनल। फिल्म के निर्देशक आपके पिता ही हैं, जिन्होंने आपको एक सफल एक्टर बनाया। अब तो आप सुपरस्टार भी कहलाएंगे? इसलिये कि भोजपुरी में हर किसी को सुपरस्टार लिखवाने का शौक हो जाता है। लेकिन मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो दो-चार फिल्म के बाद खुद को सुपरस्टार कहलाना पसंद करूं। वैसे भी मुझे इस शब्द से ही परहेज है। मैं एक बेहतर एक्टर बनकर रहना चाहता हूं। इसी में लोगों को प्यार और सम्मान हासिल होगा। अगर आप दर्शकों से जुड़ा रहना चाहते हैं तो उनसे प्यार लेने का उपाय कीजिये। जहां आप बड़े होने का नाटक करेंगे, सबसे दूर हो जाएंगे। मैं तो अभी-अभी आया ही हूं, लीड रोल का सफर चार-पांच फिल्मों का है जो हिट साबित हुआ है। मैं बड़ा नहीं, अपना एक्टर बनने का प्रयास कर रहा हूं। पिता के अलावा और भी निर्देशकों ने मुझे मौका दिया है और संवारा है। हिंदी सिनेमा में जाने का अभी कोई इरादा नहीं है। भोजपुरी में सहज हूं।