बेटा संसद में, मां को नहीं मिल रहा इंसाफ व सम्मान

इससे बड़ी बिडम्बना और क्या हो सकती है कि बेटा एक साल से सांसद बन कर संसद भवन की कुर्सी पर बैठा हो और उसकी मां को इंसाफ ना मिले। वह इंसाफ जो कि उस मां की गरिमा को बढ़ाते

हुए उसे सम्मान दिलाये। अगर मां को सम्मान मिलेगा तो खुद-ब-खुद बेटे का भी कद और उंचा हो जायेगा। सांसद में बैठे इस बेटे की मां कई सालों से अपनी मान-मर्यादा के अनुसार उचित दर्जा के

लिए बिलख-बिलख कर रोती, पुकारती और चिल्लाती है कि मेरे साथ इंसाफ करो, मुझे उचित दर्जा दो जिसका मैं वास्तव में हकदार हूं। इस मां का बेटा जब सांसद में गया तो मां को थोड़ी

आस-उम्मीद बढ़ी कि मुझे मेरा सम्मान मेरा बेटा जरूर दिलायेगा। लेकिन देखते-देखते साल बीत गया लेकिन बेटा साल भर में अपनी मां को इंसाफ नहीं दिला पाया।
जी हां, हम यहां पर बात कर रहे हैं भोजपुरी भाषा की। भोजपुरी हम सब की मां है, और इसी मां की संतान भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार व माननीय सांसद मनोज तिवारी भी हैं। क्या मनोज तिवारी

इस बात को मानने से इंकार करेंगे कि भोजपुरी उनकी मां नहीं है और वे इस मां के बेटे नहीं है?
भोजपुरी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल होने के लिए कितने सालों से क्लप रहा है लेकिन इसे संविधान की आठवीं अनुसूचि में स्थान नहीं मिल पा रहा है। खुद मनोज तिवारी ने भी

सांसद बनने के बाद यह बात कही थी कि बहुत जल्द भोजपुरी को भी संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल किया जायेगा। इसके लिए मैं हर संभव प्रयास करूंगा। लेकिन आज मनोज तिवारी को

संसद भवन में गये साल बीत गया लेकिन अभी तक भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल नहीं किया गया।
भोजपुरी भाषा को अगर संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल किया जाता है तो इससे भोजपुरी भाषा को उसका उचित सम्मान मिलेगा और हरेक भोजपुरी भाषी अपने आप को गौरवांवित महसूस करेगा। इस बात को भलीभांति हमारे माननीय सांसद और भोजपुरी मां की संतान मनोज तिवारी भी जानते है।
आज भोजपुरी मां का हर बेटा-बेटी संसद में बैठे अपने उस भाई से पूछता है कि आखिर क्यों नहीं मां को उचित इंसाफ व मान-सम्मान अब तक मिल पाया। खुद भोजपुरी मां भी अपने उस बेटे से पूछ रही है आखिर कब तक होगा मेरा साथ इंसाफ और कब मिलेगा मुझे मेरा सम्मान।