वेबसाईट संचालकों को प्रोत्साहन राशि देने के भी काबिल नहीं पीआरओ

संकेत-नीजू की कलम से

भोजपुरी फिल्म जगत के प्रचार प्रसार में लगे-भीड़े वेबसाईट के संचालकों को उचित मेहनताना तो दूरी हमारी फिल्म जगत के पीआरओ उन्हें प्रोत्साहन राशि देने के भी काबिल नहीं. कहने को तो ये लोग भोजपुरी सिनेमा जगत के सुपरस्टार अभिनेता-अभिनेत्रियों की तरह अपने आप को सुपरस्टार पीआरओ मानते हैं. फेंकने के लिए इनके पास सिर्फ बातों का जाल हीं है. ताल ठोक कर ये कहते हैं कि इस फिल्म के लिए उन्होंने एक लाख-दो लाख रूपया लिये हैं. लेकिन जब वेबसाइट संचालकों द्वारा उक्त फिल्म का प्रचार-प्रसार करने के एवज में जब रूपया की मांग की जाती है तब इनकी औकात पता चलती है. आईये इस बारे थोड़ी विस्तार से चर्चा करते हैं. भोजपुरी सिनेमा जगत का व्यवसाय दिन-दूनी रात चैगूनी तरक्की कर रहा है. जिससे भोजपुरी भाषा का फैलाव देश से लेकर विदेशों तक में हो रहा है. यह भोजपुरी भाषा के लिए गर्व की बात है. आज भोजपुरी सिनेमा जगत में करोड़ो रूपया लगाकर निर्माता फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. लाखों करोड़ों की लागत से बनी अपनी फिल्म के बारे में दर्शकों को अनभिज्ञ रखने में महत्वपूर्ण योगदान खुद निर्माता-निर्देशक हैं क्योंकि ये लोग अपने फिल्म के प्रचार प्रसार का जिम्मेवारी जो पेट-भरू पीआरओं साहब लोगों को जो दे रखे हैं. इस बात से सब कोई सहमत है कि किसी भी प्रोडक्ट की की मार्केटिंग से पहले उसका उचित प्रचार-प्रसार होना लाजमी होता है. उस प्रोडक्ट का सही प्रचार-प्रसार की उसके सफलता का सूचक होता है. अगर आपने अपने प्रोडक्ट को बाजार में उतारने से पहले उसके प्रचार-प्रसार पर बारीकी से नजर रखा तो आपका प्रोडक्ट हिट वरना फ्लाॅप साबित होता है. भले हीं आप उच्चतम क्वालिटी का प्रोडक्ट लेकर बाजार में उतरे हों लेकिन उसका उचित प्रचार-प्रसार नहीं होगा तो वह धरा का धरा हीं रह जाता है और उसे फ्लाॅप प्रोडक्ट की श्रेणी में रख दिया जाता है. इसी लिए किसी भी प्रोडक्ट के निर्माता एक बजट तय कर उसके प्रचार प्रसार के लिए मोटी रकम उसके प्रचारक को सौंप देते हैं, ताकि उनके प्रोडक्ट का उचित प्रचार-प्रसार हो सके.  ठीक ऐसा है फिल्मों के साथ हीं है. हमारे फिल्मों के निर्माता अपनी फिल्म की बजट में उसके प्रचार-प्रसार पर खर्च होने वाली राशि को भी शामिल करते हैं, जो राशि फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए अनुमोदित की जाती है वह सीधे उस फिल्म के जनसंपर्क पदाधिकारी महोदय को जाती है. जिन्हें संक्षिप्त और आम भाषा में पीआरओ कहते हैं. हर फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए निर्माता को पीआरओ की आवश्यकता पड़ती है, तब निर्माता अपनी फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए एक पीआरओ का चयन करते हैं. जिसके लिए उन्हें अच्छी खासी रकम भी फिल्म निर्माता द्वारा अदा की जाती है. ऐसे में जब फिल्म निर्माता द्वारा प्रचार-प्रसार के लिए मोटी रकम खर्च की जाती है तो फिर ये पीआरओ साहब क्यों नहीं उस फिल्म का सही माप-दण्ड पर प्रचार-प्रसार करते हैं. क्यों फिल्म संबंधित क्षेत्र के दर्शकों तक अपनी पहुॅंच बना पाती है. इसका सबसे बड़ा कारण है आज के समय में भोजपुरी सिनेमा जगत के पीआरओं साहब का …प्याज काटना. फलतः भुगतना पड़ता है निर्माता – निर्देशक को. जिसके लिए ये लोग स्वयं जिम्मेवार हैं. देखा जाये तो फिल्म पीआरओ की नियुक्ति फिल्म के मुहुर्त के पहले हीं हो जाती है. लेकिन पीआरओ साहब फिल्म मुहूर्त का न्यूज प्रसारित और प्रकाशित करवा कर पांव पर पांव चढ़ाकर सो जाते हैं. फिर इनकी नींद खुलती है फिल्म के प्रदर्शन के समय. बीच के दिनों में पीआरओ साबह निर्माता द्वारा फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए आवंटित राशि का भुंजा फांक कर कुम्भकर्णी निद्रा में निद्रा देवी का आवाहन करने में मशगूल हो जाते हैं. फिर आप हीं बताइये कैसे होगी उक्त फिल्म का सही दिशा में प्रचार-प्रसार. इन्हें क्या इनको तो उस फिल्म के प्रचार के लिए राशि मिल हीं गयी होती है या निर्माता-निर्देशक को उलटा-सीधा पढ़ा कर मिल हीं जायेगी. भले हीं प्रचार-प्रसार की कमी के वजह से फिल्म पीट जाये और निर्माता-निर्देशक को इसका नुकसान उठाना पड़े. भोजपुरी सिनेमा के प्रचार-प्रसार के लिए कुछ चुनिन्दा वेबसाइटे हैं. इन वेबसाइट संचालकों द्वारा बार-बार फोन कर फिल्म की शुटिंग स्टील फोटोग्राफी, फिल्म पोस्टर, फिल्म प्रोमा की मांग पीआरओ साहब से मांगने पर भी उक्त चीजें पीआरओ साहब द्वारा संचालकों को मुहैया नहीं कराया जाता है. ये सारी प्रचार सामग्री देने में पीआरओं साहब ऐसे कतराते हैं जैसे कि वेबसाइट संचालक द्वारा फिल्म की प्रचार सामग्री नहीं पीआरओं साहब की जान मांग ली हो. ऐसे में जब सीधा निर्माता-निर्देशक से फिल्म की प्रचार सामग्री मांगी जाती है तो वे साफ तौर पर यह कहते हुए बात को टाल देते हैं कि सभी सामग्रियां पीआरओ के पास उपलब्ध है उनसे मांग लें. इतना हीं नहीं अगर किसी अभिनेता या अभिनेत्री से वेबसाइट संचालक सीधे तौर पर संपर्क साधकर उनसे न्यूज और उनसे संबंधित फिल्म की जानकारी के बारे में बात करते हैं तो ये लोग भी अपना पल्ला झाड़ते हुए यह कह देते हैं कि उक्त जानकारी हमारे पीआरओ से ले लीजिये. ऐसे में वेबसाइट संचालक फिल्म की प्रचार सामग्री के लिए गरजू बनकर बार-बार निवेदन पीआरओ साहब से करते हैं लेकिन पीआरओ साहब कान में तेल-रूई डाल कर बैठे रहते हैं. इतना हीं नहीं ये पीआरओ फिल्म से संबंधित नाम मात्र का न्यूज कुछ अखबारों में प्रकाशित करवाते है, और ये अखबार नीचले स्तर के होते हैं. जिनका बाजार में स्थान सातवें-आठवें नंबर पर होता है. बिहार से प्रकाशित कुछ ऐसे अखबारों में ये फिल्म का प्रचार करवाते हैं जिसका पहुंच सिर्फ पटना और आस-पास के इलाकों तक हीं सीमित रह जाता है. क्या हमारे पीआरओ साहब कभी किसी भोजपुरी फिल्म का प्रमोशन बिहार से प्रकाशित अंग्रेजी अखबारों में करवाये हैं. बिहार से कई अंग्रेजी अखबारों का प्रकाशन होता है लेकिन भोजपुरी सिनेमा की खबरें उसमें दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती है. हमारे सिनेमा जगत के पीआरओ निर्माताओं को दिखाने के लिए बंगाल के कुछ अखबारों में साप्ताहिक रूप में प्रकाशित करवाते हैं. जहां पर सिर्फ गिने-चुने हीं भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन होता है. ऐसे में निर्माताओं – निर्देशकों के पास दो-चार अखबार की कटिंग भेज कर ये पीआरओ उन्हें धूर्त बनाते हुए अपनी जेबें उंची कर लेते हैं. अंततः भुगतते हैं निर्माता. आप सब जरा सोचिये ऐसे स्थिति में क्या ये पीआरओ साहब बता सकते हैं कि अंग्रेजी पढ़ने वाले लोग भोजपुरी सिनेमा को नहीं देखते. तो क्यों नहीं ये लोग किसी भी अंग्रेजी अखबार में निरंतर उक्त फिल्म से संबंधित खबरों का प्रकाशन करवाते हैं?
एक बात हम आज आप सब से पूछते हैं कि क्या भोजपुरी सिनेमा के प्रचार प्रसार के लिए दिन भर अपना समय और पैसे लगा कर वेबसाइट का संचालन करने के बाद भी क्या वेबसाइट संचालक अपनी उचित मेहनताना का हकदार नहीं हैं. मेहनताना तो दूर कि बात है इन वेबसाइट संचालकों को पीआरओ-निर्माता-निर्देशक-अभिनेता-अभिनेत्रियों द्वारा प्रोत्साहन राशि भी नहीं दिया जाता है. आप लोग जरा सोचिये क्या ये वेबसाइट संचालक मेहनताना के हकदार नहीं हैं? तो फिर क्यों नहीं पीआरओ-निर्माता-निर्देशक-अभिनेता-अभिनेत्रियों द्वारा इन्हें उचित मेहनताना दिया जाता है? वेबसाइट संचालकों की राय मानें तो ये लोग मेहनताना नहीं चाहते हैं. क्या कभी पीआरओ-निर्माता-निर्देशक-अभिनेता-अभिनेत्रियों द्वारा इन्हें अपनी मर्जी से बिना मांगे कोई राशि प्रदान की गयी?  इनलोगों की राय में अगर पीआरओ-निर्माता-निर्देशक-अभिनेता-अभिनेत्रियों द्वारा अगर कुछ प्रोत्साहन राशि भी प्रतिमाह मिलते रहे तो ये लोग खुश हैं. तो पीआरओ-निर्माता-निर्देशक-अभिनेता-अभिनेत्रियों को चाहिए की अपनी एक बैठक कर इन वेबसाइट संचालकों के लिए प्रतिमाह कुछ प्रोत्साहन राशि ही बंधित कर देना चाहिए.

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