हीरोइनें ज्यादा मेहनत करती हैं -रानी चटर्जी

सबीहा खान किस तरह रानी चटर्जी बनकर आज भोजपुरी सिनेमा की महारानी बनी हुई हैं, यह बहुत दिलचस्प कहानी है। अगर उंगलियों पर इनकी फिल्मों का हिसाब करने बैठें तो वह आंकड़ा सवा सौ तक पहुंचता है, ले किन कामयाबी की नजर से देखें तो उपलब्धियों की बड़ी दुनिया अपने में समेटे हुई हैं। यही वजह है कि इनके सामने हर साल हीरोइनें इस इंडस्ट्री में आती रहीं लेकिन इनकी ऊंचाई तक पहुंच पाना किसी के लिये संभव नहीं हो पाया -रानी चटर्जी

 आपकी पहली फिल्म ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’ से भोजपुरी सिनेमा का नया और तीसरा सफल दौर शुरू हुआ है, तब से आप बनी हुई हैं। यह आपको किस हद तक रोमांचित करता है?  यह सोचना बहुत खुशगवार लगता है कि अजय सिन्हा ने मुझे मौका देकर भोजपुरी सिनेमा के सफल इतिहास का अहम हिस्सा बनाया। इसके बावजूद बीच में मुझे परदे से गायब हो जाना पड़ा था, यह मुझे कभी- कभी आश्र्चय कर देता है। एक सुपरहिट फिल्म देने के बाद भी इंडस्ट्री ने हीरोइन को तुरंत पीछे धकेल दिया, जबकि हीरो को सुपरस्टार का दर्जा दे दिया। हीरोइन के रूप में मुझे यह अटपटा सा लगता है लेकिन मैं यह भी मानती हूं कि ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता’। खुशी है कि दर्शकों ने याद रखा। शायद यही वजह होगी जब मेरे लिये फिर से जगह बनाई गयी। संभव है ऊपर वाला मेरे धैर्य की परीक्षा ले रहा हो। उसके बाद जो मेरा सफर शुरू हुआ है वह अभी तक सफलता के साथ चल रहा है। पीछे पलटकर देखती हूं तो कभी-कभी खुद पर विास नहीं होता है कि कहां से चली थी और कहां पहुंच गयी। मुंबई के एक छोर पर बसे वसई रोड की चाल में रहने वाली एक मिडिल क्लास की लड़की को भोजपुरी ने सिर आंखों पर बिठा लिया, इसका मुझे हमेशा गर्व रहेगा। आपको दर्शक हीरोइनों का सुपरस्टार कहते हैं, स्त्री प्रधान फिल्मों की शुरुआत भी आपसे ही हुई है और आपके दम पर फिल्में भी चलती हैं, लेकिन नाम के पहले सुपरस्टार का विशेषण आपके साथ क्यों नहीं जोड़ा जाता? हिंदी सिनेमा हो या साउथ की इंडस्ट्री, हर जगह दर्शक ही कलाकारों को सुपरस्टार बनाते हैं। भोजपुरी का गुण कहें या अवगुण, यहां पहली फिल्म के बाद ही हीरो सुपरस्टार बनना और कहलाना पसंद करने लगते हैं। इसमें दर्शकों की राय तक नहीं ली जाती। वैसे हर इंडस्ट्री में हीरोइनों के साथ एक जैसा ही सलूक किया जाता है। हिंदी में कितनी हीरोइनें हैं जो अकेले अपने दम पर फिल्म को न केवल हिट कराती हैं बल्कि हीरो के पैरेलल चुनौती बनकर खड़ी भी होती हैं। मगर क्या कभी उन्हें वह दर्जा कभी मिलता जो हीरो को मिलता है। फिर तो भोजपुरी से वह उम्मीद करना ही बेकार है। दरअसल हमारा समाज पुरु ष वर्चस्व वाला है। पूरा तंत्र उन्ही के बनाये नियम-कानून से चलता है। कहने के लिये हम आधी आबादी हैं लेकिन हमारी हिस्सेदारी को एकदम सीमित कर दिया गया है। भोजपुरी में भी कई हीरोइनें, पूरी फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चलती हैं, लेकिन उन्हें हीरो के मुकाबले पैसे काफी कम दिये जाते हैं। पाखी हेगड़े, रिंकू घोष के साथ कई बार हमसे इस मुद्दे पर बातचीत हुई और हमने मांग भी रखी। पैसे बढ़े जरूर मगर मेकर्स ने एक विकल्प भी ढूंढ लिया। नयी हीरोइनों को ब्रेक देने के नाम पर कम पैसे में साइन करने का रिवाज शुरू कर दिया। हालांकि इस बात की खुशी होती है किसी बहाने सही, नयी लड़कियों को मौके मिल जाते हैं। हीरोइनें नयी हों या सीनियर, वे अपने रोल और काम पर ज्यादा मेहनत करती हैं, मगर उन्हें हमेशा कमतर आंका जाता है। अगर बराबरी का दर्जा दे दिया जाये तो तो जो परिणाम आयेगा वह चौकाने जैसा होगा। इससे सिनेमा को जबर्दस्त फायदा होगा। भोजपुरी के शिखर पर पहुंच गयी हैं, आपका आगे का रास्ता हिंदी की ओर क्यों नहीं जा पा रहा है ? जाना तो वहां चाहिये जहां आप अपने सम्मान और सफलता को बरकरार रख सकें। हिंदी में कई बार काम करने के लिये ऑफर आये लेकिन दूसरे-तीसरे स्तर का काम कर क्या होगा? हां, फिल्म छोटी ही सही मगर अच्छे रोल मिले तो सोचा जा सकता है। भोजपुरी में मुझे कोई दिक्कत कहां है? भरपूर प्यार और इज्जत के साथ जीवन जी रही हूं। संतुष्ट हूं और यहां पर स्टारडम कायम है, हिंदी में छोटे-छोटे काम कर खो जाने का मन अब नहीं है। सीरियल के ऑफर भी आते रहते हैं। पिछले दिनों एक सीरियल ‘सर्विस वाली बहू’ को भी मना इसलिये कर दिया कि रात-दिन व्यस्त हो जाना पड़ता, तब हमारा सिनेमा छूट जाता। फिलहाल सिनेमा से विदाई का कोई इरादा नहीं है